अहसास दिलाकर ही अमेठी में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है।

स्मृति जुबिन ईरानी की अमेठी हार: संगठन की कमजोरी या कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता ?

 

 

 

उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट, जिसे कभी गांधी परिवार का अभेद्य गढ़ माना जाता था, 2019 में केंद्रीय मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी की ऐतिहासिक जीत के साथ भाजपा के खाते में आई। इस जीत ने दशकों पुराने कांग्रेस के दबदबे को तोड़ा और अमेठी के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव का संकेत दिया। लेकिन हालिया चुनावों में स्मृति ईरानी को हार का सामना करना पड़ा, जिसने भाजपा संगठन और कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हार संगठन की कमजोरी थी या कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता, इस पर मंथन जरूरी हो गया है।

स्मृति ईरानी का प्रयास: “दीदी” की भूमिका और विकास का विजन

 

पूर्व केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी ने अमेठी को अपना दूसरा घर समझा। उन्हें यहां की जनता ने स्नेहपूर्वक “दीदी” के रूप में स्वीकार किया। उनके प्रयासों से अमेठी में सड़कों, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर कई परियोजनाएं प्रारंभ हुईं। उन्होंने अमेठी की जनता के बीच विश्वास कायम किया, लेकिन चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि जमीनी स्तर पर संगठन ने उनका पर्याप्त साथ नहीं दिया।

 

कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता: “फोटोशूट की राजनीति” पर सवाल– ?

 

जमीं पर पैर टिके हों तो जीत पक्की होती है,

पर हवा में उड़ने वालों को जमीन हरा देती है।”

 

अमेठी में भाजपा के कई कार्यकर्ता, जिनसे जनता के बीच पहुंच बनाने की अपेक्षा थी, सोशल मीडिया और फोटोशूट तक सीमित नजर आए। चुनाव के दौरान बूथ स्तर पर सक्रियता की कमी और जनसंपर्क में ढिलाई ने हार में अहम भूमिका निभाई। कई बूथों पर स्थानीय नेतृत्व की निष्क्रियता स्पष्ट रूप से महसूस की गई।

 

बूथ और मंडल स्तर पर संगठन का असंतुलन– 

 

 

“दीवारें गिरती हैं अगर नींव में दरार हो,

चुनाव में हार होती है जब संगठन लाचार हो।”

 

अमेठी में भाजपा संगठन का ढांचा बूथ और मंडल स्तर पर उतना मजबूत नहीं दिखा, जितनी अपेक्षा की जाती है। भाजपा की नीतियों और नेतृत्व की लोकप्रियता को जनता तक ले जाने का काम अधूरा रह गया। कई क्षेत्रों में बूथ समितियां केवल कागजी तौर पर सक्रिय रहीं। इसके विपरीत, विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर अधिक मुस्तैद दिखे।

 

स्थानीय नेतृत्व बनाम शीर्ष नेतृत्व

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्मृति जुबिन ईरानी की लोकप्रियता आज भी निर्विवाद है। उनका विजन और नेतृत्व भाजपा की ताकत का स्तंभ है। लेकिन अमेठी में हार ने यह स्पष्ट कर दिया कि शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता तभी प्रभावी हो सकती है जब स्थानीय संगठन और कार्यकर्ता प्रभावी भूमिका निभाएं।

आगे का रास्ता: संगठन में युवा और कर्मठ नेतृत्व की जरूरत

 

“नई सोच, नया प्रयास अगर हो मैदान में,

तो जीत हर हाल में होती है किसान के धान में।”

 

अगर भाजपा को अमेठी में पुनः मजबूत करना है, तो सबसे पहले संगठन के बूथ और मंडल स्तर पर बदलाव लाना होगा। कर्मठ, जमीनी कार्यकर्ताओं और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने से ही पार्टी अपनी खोई जमीन वापस पा सकती है। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को सही प्रशिक्षण देकर और उन्हें जिम्मेदारी का अहसास दिलाकर ही अमेठी में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है।

निष्कर्ष–  संगठनात्मक सुधार का समय

 

“जो संगठन मजबूत है, वही जीत का अधिकारी है,

वरना मेहनत अधूरी रह जाती है जमीं पर यारी है।”

 

स्मृति जुबिन ईरानी ने अमेठी के विकास के लिए जो प्रयास किए हैं, वह जनता भूली नहीं है। लेकिन भाजपा संगठन की आंतरिक कमजोरी और कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। भाजपा के लिए यह जरूरी है कि वह संगठन के नींव को मजबूत करे, ताकि आने वाले समय में अमेठी में एक बार फिर कमल खिल सके।